यूपी की बस राजनीति के बारे में व्यंग्यात्मक विचार
रिपोर्ट दिनेश साहू आसींद
आसींद जैसा कि यूपी में बस विवाद छिड़ा हुआ था तो उस में सर्वप्रथम बात तो यह थी कि एक हजार बसों की जगह 800 के लगभग बस ही बताई जा रही है पर मान लो 500 बस ही थी उनको भी अगर स्वीकृति दी जाती है तो भी एक बस में 10 मजदूरों के हिसाब से भी 500 बसों में 5000 मजदूर अपने घर पहुंच जाते हैं और जहां वह छोड़ कर आते वहां से अगर कोई मजदूर मिलते तो उन्हें भी वापस ला सकते थे दूसरा आरोप यह है कि राजनीति कर रहे हैं तो भाई राजनेता है तो राजनीति करेंगे डॉक्टर है तो वह इलाज करेंगे अध्यापक है तो पढ़ाई का काम करेंगे इसी प्रकार राजनेता है तो राजनीति ही करेंगे राजनीति में पहले यह चलन था कि 1 रुपया पहुंचा थे तो 16 पैसा पहुंचता था लेकिन आजकल राजनीति में राजनेता 1 गुना काम करता है तो उसे 10 गुना बताकर वाहवाही लूटते हैं यही आजकल की राजनीति में चल रहा है अब बात बसों के खाली लौट कर जाने पर तो बसों को खाली क्यों लौटा रहे हो अधिकतर बसें तो राजस्थान की है उनमें तो मजदूरों को बिठाकर उनके स्थान पर पहुंचाया जा सकता है राजस्थान से भी मजदूर कई राज्यों में से पैदल आ रहे हैं और कई राज्यों में पैदल जा रहे हैं अब जहां-जहां कांग्रेस की सरकार है वहां वहां तो अनुमति लेने देने मैं तो कोई परेशानी है ही नहीं तो इन खाली बसों में उन मजदूरों को बिठाकर उनके स्थानों तक पहुंचा दिया जाए अब भला ही करना है मजदूरों का तो यूपी के मजदूरों का भला नहीं हुआ तो क्या हुआ दूसरे राज्यों के मजदूरों का भला कर दीजिए वह भी तो दुआ देंगे
बाकी जनता सब समझदार है
