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मध्य प्रदेश में कल वोटिंग, पहली बार 5 किन्नर भी हैं मैदान में




मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के सियासी रण में एक फीसदी से भी कम वोट हिस्से वाले किन्नर भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. राज्य की पांच विधानसभा सीटों पर किन्नर उम्मीदवार हैं. इनके चुनाव प्रचार में के लिए आसपास के जिलों के ही नहीं दिल्ली, मुंबई, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के किन्नर घूम-घूम कर वोट मांग रहे हैं.

मध्य प्रदेश के सियासी इतिहास में 1998 में पहली बार कोई किन्नर चुनाव जीतकर विधायक बनी थी. शहडोल जिले की सोहागपुर सीट से शबनम मौसी निर्दलीय चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचने में कामयाब हुई थीं.

जयसिंह नगर सीट

बीस साल के बाद एक बार फिर उसी इतिहास को दोहराने के लिए शहडोल की ही जयसिंह नगर विधानसभा सीट से इस बार शालू मौसी निर्दलीय चुनाव मैदान में है. शालू मौसी युवाओं को रोजगार दिलाने के मुद्दे को लेकर वोट मांग रहे हैं.

मुरैना की अंबाह सीट पर नेहा

ग्वालियर चंबल इलाके के तहते आने वाले मुरैना जिले की अंबाह विधानसभा सीट पर नेहा किन्नर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में उतरी हैं. सपाक्स ने इस सीट पर नेहा किन्नर को अपना समर्थन दिया है. ये उम्मीदवार जनता की सेवा के नाम पर घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं.

होशंगाबाद से पंछी देशमुख

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद विधानसभा सीट से हिंदू महासभा से पंछी देशमुख मैदान में उतरी हैं. वो किन्नरों के लिए आरक्षण और नौकरी जैसे मुद्दे को लेकर वोट मांग रहे हैं.

दमोह से रिहाना

बुंदेलखंड की दमोह विधानसभा सीट से रिहाना सब्बो बुआ निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में हैं. वो क्षेत्र के विकास और रोजगार के नाम पर वोट मांग रही हैं. जीतने पर सबको पक्की नौकरी का वादा किया है.

इंदौर-2 से बाला

मध्य प्रदेश के इंदौर-2 नंबर सीट से से बाला वैशवारा निर्दलीय चुनावी मैदान में हैं. ये महिलाओं और किन्नरों को रोजगार दिलाने के वादे को लेकर वोट मांग रही हैं.

किन्नरों के लिए राजनीति का द्वार शबनम मौसी ने 1998 में ही खोला था. वह पहली भारतीय किन्नर हैं जो चुनाव लड़ीं और विधायक चुनी गईं. 20 साल बाद आज भी राजनीति के क्षेत्र में किन्नर नाममात्र ही हैं. 2014 के लोकसभा चुनावों में पहली बार चार किन्नर उम्मीदवार खड़े हुए. ये चारों ही निर्दलीय थे. इन चारों में से किसी को भी जीत हासिल नहीं हुई थी.

भारतीय समाज में किन्नर स्त्रियों की अपेक्षा और भी ज्यादा हाशिए पर हैं क्योंकि उनके सामने अभी तक अपनी पहचान और सम्मान का ही संकट है. इस तबके के लिए राजनीति में हाथ आजमाना और भी बड़ी बात है. यूपी के गोरखपुर नगर निगम से किन्नर आशा देवी महापौर का चुनाव जीती थीं. 2017 के विधानसभा चुनाव में फैजाबाद सीट से भी किन्नर ने अपनी किस्मत आजमाई थी, लेकिन जीत नहीं सकीं.



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